नोटबंदी के 9 साल: क्या खोया, क्या पाया?

कुछ ही दिन पहले, 8 नवंबर को, देश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 2016 में की गई ऐतिहासिक नोटबंदी की 9वीं सालगिरह को पार किया है। इस (Demonetisation) के फैसले…

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कुछ ही दिन पहले, 8 नवंबर को, देश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 2016 में की गई ऐतिहासिक नोटबंदी की 9वीं सालगिरह को पार किया है। इस (Demonetisation) के फैसले पर बहस 9 साल बाद भी उतनी ही गर्म है, जितनी यह शुरू हुई थी। 9वीं वर्षगाँठ पर जहाँ विपक्ष ने इसे “तुगलकी फैसला” और “आर्थिक तबाही” करार दिया, वहीं सरकार ने इसे डिजिटल क्रांति की नींव बताया। यह विश्लेषण इस विवादास्पद कदम के घोषित लक्ष्यों और आज की ज़मीनी हकीकत की पड़ताल करता है।

📰 मुख्य तथ्य (Quick Take)

  • ताज़ा बहस (8 नवंबर 2025): 9वीं सालगिरह पर कांग्रेस ने इसे “तुगलकी फैसला” बताया जिससे अर्थव्यवस्था “कभी उबर नहीं पाई” (स्रोत: जनसत्ता); टीएमसी ने इसे “भारतीयों के साथ सबसे बड़ा धोखा” कहा (स्रोत: इकोनॉमिक टाइम्स)।
  • काला धन लक्ष्य: 2018 की RBI रिपोर्ट के अनुसार, प्रतिबंधित ₹15.41 लाख करोड़ में से 99.3% (₹15.31 लाख करोड़) बैंकिंग सिस्टम में वापस आ गए।
  • डिजिटल भुगतान (सफलता): UPI लेनदेन अक्टूबर 2025 में ₹27.28 लाख करोड़ के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँच गया (स्रोत: टाइम्स ऑफ इंडिया)। 2025 की पहली छमाही में, डिजिटल भुगतान का लेनदेन की मात्रा (volume) में 99.8% हिस्सा था।
  • नकदी का विरोधाभास: डिजिटल उछाल के बावजूद, जनता के पास नकदी (Currency with Public) 2016 में ₹17.97 लाख करोड़ से बढ़कर अक्टूबर 2025 में ₹37.29 लाख करोड़ हो गई है (स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस/RBI)।
  • आर्थिक प्रभाव: इस कदम से MSME क्षेत्र और असंगठित अर्थव्यवस्था को गंभीर, तत्काल झटका लगा, जिससे GDP वृद्धि में अस्थायी मंदी आई।

9वीं सालगिरह पर ताज़ा राजनीतिक बहस

8 नवंबर 2025 को नोटबंदी की 9वीं बरसी ने एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में तूफान ला दिया। विपक्ष ने इस दिन को सरकार की आर्थिक नीतियों पर हमला करने के अवसर के रूप में इस्तेमाल किया।

  • कांग्रेस का हमला: कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर कहा कि यह एक “विनाशकारी तुगलकी फैसला” था जिसने “करोड़ों भारतीयों की आजीविका तबाह कर दी” और MSME सेक्टर को “पंगु” बना दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था उस चोट से “कभी भी पूरी तरह से उबर नहीं पाई है” और इस बात पर भी प्रकाश डाला कि बाद में लाए गए ₹2,000 के नोट को भी वापस ले लिया गया है।
  • तृणमूल कांग्रेस का विरोध: टीएमसी के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने इसे “भारतीयों के साथ सबसे बड़ा धोखा” करार दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के 2016 के उस भाषण की क्लिप साझा की जिसमें उन्होंने 50 दिनों का समय मांगा था।
  • ‘काला दिवस’: अरुणाचल प्रदेश कांग्रेस कमेटी सहित पार्टी की कई राज्य इकाइयों ने 8 नवंबर को “काला दिवस” के रूप में मनाया, जिसमें इस कदम से हुए आर्थिक नुकसान को उजागर किया गया।

सरकार के समर्थकों ने इन आलोचनाओं का खंडन करते हुए तर्क दिया कि इस कदम का दीर्घकालिक लाभ डिजिटल अर्थव्यवस्था के रूप में स्पष्ट है।

9 साल का लेखा-जोखा: लक्ष्य बनाम हकीकत

8 नवंबर 2016 को जब प्रधानमंत्री मोदी ने ₹500 और ₹1,000 के नोटों को (जो उस समय चलन में 86% नकदी थे) अमान्य घोषित किया, तो उन्होंने चार मुख्य लक्ष्य बताए थे। आइए देखें कि 9 साल बाद उनकी क्या स्थिति है।

1. लक्ष्य: काले धन पर प्रहार (विफल)

यह नोटबंदी का सबसे प्रमुख लक्ष्य था। तर्क यह था कि अवैध नकदी रखने वाले इसे बैंकों में जमा करने से डरेंगे और यह “काला धन” नष्ट हो जाएगा।

  • आँकड़ा 1: 99.3% मुद्रा की वापसी
    अगस्त 2018 में जारी अपनी वार्षिक रिपोर्ट में, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने पुष्टि की कि प्रतिबंधित किए गए ₹15.41 लाख करोड़ मूल्य के नोटों में से ₹15.31 लाख करोड़ (यानी 99.3%) बैंकिंग प्रणाली में वापस जमा हो गए।
    विश्लेषण: इस आँकड़े ने काले धन को नष्ट करने के दावे को लगभग समाप्त कर दिया। यह स्पष्ट हो गया कि लगभग सारा पैसा, चाहे वह वैध हो या अवैध, वापस बैंकों में आ गया। हालाँकि सरकार ने तर्क दिया कि सिस्टम में वापस आने से संदिग्ध जमाओं की पहचान करने और उन्हें टैक्स के दायरे में लाने में मदद मिली।

2. लक्ष्य: जाली मुद्रा और आतंकी फंडिंग (आंशिक सफलता)

दावा किया गया था कि यह कदम जाली भारतीय मुद्रा (FICN) और आतंकी फंडिंग नेटवर्क की कमर तोड़ देगा।

विश्लेषण: गृह मंत्रालय की रिपोर्टों ने समय-समय पर दावा किया है कि इस कदम से आतंकी घटनाओं (जैसे कश्मीर में पत्थरबाजी) में तत्काल कमी आई क्योंकि फंडिंग नेटवर्क बाधित हो गया था। हालाँकि, यह प्रभाव अस्थायी था। RBI के आँकड़े यह भी दिखाते हैं कि बाद के वर्षों में ₹500 और ₹2,000 के नए नोटों की उच्च-गुणवत्ता वाली जाली प्रतियाँ भी पकड़ी गईं।

3. लक्ष्य: डिजिटल भुगतान को बढ़ावा (अभूतपूर्व सफलता)

यह एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जहाँ नोटबंदी को एक जबरदस्त, यद्यपि अनपेक्षित, सफलता के रूप में देखा जाता है। नकदी की भारी कमी ने लोगों को डिजिटल भुगतान अपनाने के लिए मजबूर कर दिया।

  • आँकड़ा 2: UPI क्रांति
    नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) द्वारा संचालित UPI इसका सबसे बड़ा लाभार्थी रहा।
  • अक्टूबर 2025 (ताज़ा): UPI ने इस साल त्योहारी खरीदारी के दौरान एक नया कीर्तिमान स्थापित किया, जिसमें अक्टूबर 2025 में ₹27.28 लाख करोड़ मूल्य के लेनदेन दर्ज किए गए। (स्रोत: द टाइम्स ऑफ इंडिया, 3 नवंबर 2025)
  • RBI डेटा (2025): 2025 की पहली छमाही (H1 2025) के लिए RBI के हालिया आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में कुल भुगतान लेनदेन की मात्रा (volume) में डिजिटल भुगतान का हिस्सा 99.8% है। 

विश्लेषण: आज भारत रीयल-टाइम डिजिटल भुगतान में दुनिया का नेतृत्व करता है। नोटबंदी ने उस व्यवहारिक बदलाव को उत्प्रेरित किया, जिसने भारत को “कैश-लाइट” अर्थव्यवस्था बनने की राह पर डाल दिया।

विश्लेषण: नकदी बनाम डिजिटल का विरोधाभास

डिजिटल भुगतान की सफलता के बावजूद, एक दिलचस्प विरोधाभास सामने आया है जिसने 9वीं वर्षगाँठ पर बहस को और तेज कर दिया है।

  • आँकड़ा 3: नकदी का बढ़ता चलन
    “कैशलेस” अर्थव्यवस्था के लक्ष्य के विपरीत, जनता के पास नकदी (Currency in Circulation) का स्तर नोटबंदी से पहले की तुलना में दोगुना से अधिक हो गया है।
  • 4 नवंबर 2016 (नोटबंदी से पहले): ₹17.97 लाख करोड़
  • 17 अक्टूबर 2025 (नवीनतम डेटा): ₹37.29 लाख करोड़ 

विश्लेषण: विशेषज्ञ बताते हैं कि यह विरोधाभास भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रकृति को दर्शाता है। जहाँ UPI छोटे और मध्यम मूल्य के लेनदेन (जैसे किराना, टैक्सी) के लिए पसंदीदा बन गया है (जो 85% वॉल्यूम है), वहीं बड़े मूल्य के लेनदेन और मूल्य के भंडार (store of value) के रूप में नकदी अभी भी “राजा” है।

इसके अतिरिक्त, इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, 2016 में CIC-से-GDP अनुपात 12.1% था, जो 2025 में सुधरकर 11.11% हो गया है, लेकिन यह अभी भी कई अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अधिक है।

निष्कर्ष: 9 साल बाद की विरासत

आज, 11 नवंबर 2025 को, नोटबंदी की विरासत पहले से कहीं अधिक जटिल है।

यह निर्विवाद है कि यह अपने प्रमुख घोषित लक्ष्य काले धन को खत्म करने में विफल रहा। इसने असंगठित क्षेत्र और MSME को भारी कीमत चुकाने पर मजबूर किया, जिससे लाखों लोग प्रभावित हुए।

लेकिन, इसने अनजाने में भारत को दुनिया की सबसे उन्नत डिजिटल भुगतान अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनने के लिए मजबूर कर दिया। 9वीं सालगिरह पर हुई तीखी राजनीतिक बहस (जैसा कि 8 नवंबर को देखा गया) यह साबित करती है कि भारत अभी भी इस सवाल से जूझ रहा है: क्या यह डिजिटल क्रांति उस आर्थिक पीड़ा के लायक थी? इसका उत्तर शायद “हाँ” या “नहीं” में नहीं, बल्कि इस बात में निहित है कि भारत ने इस आर्थिक सर्जरी से क्या सबक सीखे।

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