ध्रुवीकरण का ‘इस्लामोफोबिया’ कनेक्शन?

भारत का सामाजिक और राजनीतिक विमर्श एक अभूतपूर्व चौराहे पर है। एक तरफ देश आर्थिक और तकनीकी प्रगति के दावे कर रहा है, वहीं दूसरी ओर समाज में ध्रुवीकरण की…

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भारत का सामाजिक और राजनीतिक विमर्श एक अभूतपूर्व चौराहे पर है। एक तरफ देश आर्थिक और तकनीकी प्रगति के दावे कर रहा है, वहीं दूसरी ओर समाज में ध्रुवीकरण की खाई गहरी होती जा रही है। इस बीच, एक नया और परेशान करने वाला नैरेटिव उभर रहा है: यह कि ‘अति-वामपंथी लॉबी’ (far-left lobby) जानबूझकर ‘इस्लामोफोबिया’ (Islamophobia) जैसे मुद्दों को हवा दे रही है, ताकि समाज को पूरी तरह से बाँटा जा सके। आरोप यह भी है कि इस खेल में डॉक्टर और इंजीनियर जैसे पढ़े-लिखे पेशेवरों को भी घसीटा जा रहा है, ताकि संस्थागत विश्वास को जड़ से खत्म किया जा सके। यह विश्लेषण इसी जटिल दावे, इसके पीछे की हकीकत और भारतीय समाज पर इसके पड़ने वाले गंभीर प्रभावों की पड़ताल करता है।

मुख्य तथ्य (Quick Take)

  • ध्रुवीकरण बढ़ा: प्यू रिसर्च सेंटर (2021) के अनुसार, भारतीय अपनी धार्मिक पहचान को लेकर मज़बूत राय रखते हैं और अक्सर अपने ही समुदाय के भीतर रहना पसंद करते हैं, जो सामाजिक ध्रुवीकरण का संकेत है।
  • पेशेवरों पर संकट: इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) के 2019 के एक अध्ययन में पाया गया कि 75% डॉक्टरों ने अपने कार्यस्थल पर हिंसा का सामना किया है, जो व्यवस्था में विश्वास की कमी को दर्शाता है।
  • नैरेटिव वॉरफेयर: ‘इस्लामोफोबिया’ और ‘हिंदूफोबिया’ जैसे शब्द अब केवल अकादमिक बहस का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि राजनीतिक लामबंदी और एक-दूसरे को बदनाम करने के हथियार बन गए हैं।
  • वैश्विक पैटर्न: अमेरिका और ब्रिटेन में भी राजनीतिक ध्रुवीकरण ने आंतरिक अशांति और संस्थागत विश्वास में भारी गिरावट को जन्म दिया है, जो भारत के लिए एक चेतावनी है।

‘अति-वामपंथ’ और ‘इस्लामोफोबिया’: एक जटिल नैरेटिव

यह एक स्थापित तथ्य है कि भारत समेत दुनिया भर में दक्षिणपंथी या राष्ट्रवादी राजनीति पर अक्सर ‘इस्लामोफोबिया’ (Islamophobia) को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा है। लेकिन, पिछले कुछ समय से एक विपरीत और जटिल तर्क भी विमर्श में लाया जा रहा है।

इस नए तर्क के अनुसार, एक ‘अति-वामपंथी लॉबी’ (far-left lobby) समाज में ‘इस्लामोफोबिया’ के मुद्दे को कृत्रिम रूप से या वास्तविक घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती है। इसका उद्देश्य? इस तर्क के प्रस्तावक कहते हैं कि इसका उद्देश्य मुस्लिम समुदाय को ‘पीड़ित’ के तौर पर पेश करना और हिंदू समुदाय के भीतर एक ‘प्रतिक्रियावादी’ (reactionary) ध्रुवीकरण को उकसाना है।

यह ‘रिवर्स साइकोलॉजी’ का एक खतरनाक खेल है, जहाँ दोनों पक्ष एक-दूसरे पर समाज को बाँटने का आरोप लगाते हैं। यह दावा कि ‘वामपंथी’ धड़ा खुद ‘इस्लामोफोबिया’ का प्रचार कर रहा है, पहली नज़र में विरोधाभासी लगता है। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि यह “आग को आग से बुझाने” की कोशिश नहीं, बल्कि “आग लगाकर राजनीतिक लाभ लेने” की रणनीति हो सकती है।

यदि ‘इस्लामोफोबिया’ का डर लगातार चर्चा में रहेगा, तो यह अल्पसंख्यक समुदाय को अपने धार्मिक खोल में समेटेगा। इसके समानांतर, बहुसंख्यक समुदाय के एक वर्ग में यह भावना पैदा होगी कि उन्हें ‘अनावश्यक रूप से’ खलनायक बनाया जा रहा है, जिससे वे और अधिक कट्टरपंथी रुख अपनाएंगे। नतीजा? समाज का दो स्पष्ट और विरोधी खेमों में विभाजन, जैसा कि अमेरिका (रिपब्लिकन बनाम डेमोक्रेट) और ब्रिटेन (ब्रेग्जिट) में देखा गया है।

ध्रुवीकरण की हकीकत: डेटा क्या कहता है?

यह ध्रुवीकरण केवल राजनीतिक बयानों तक सीमित नहीं है, इसके ठोस सामाजिक प्रमाण मौजूद हैं।

डेटा 1: प्यू रिसर्च सेंटर (2021)

“Religion in India: Tolerance and Segregation” (भारत में धर्म: सहिष्णुता और अलगाव) शीर्षक वाली प्यू रिसर्च सेंटर की 2021 की विस्तृत रिपोर्ट कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने रखती है।

  • सर्वेक्षण में शामिल अधिकांश भारतीयों (सभी धर्मों के) ने कहा कि वे “अपने धर्म के प्रति बहुत सहिष्णु” हैं।
  • लेकिन, इसी रिपोर्ट में पाया गया कि भारतीय अपने समुदाय के भीतर ही रहने को प्राथमिकता देते हैं। उदाहरण के लिए, 80% से अधिक हिंदुओं और मुसलमानों ने कहा कि उनके करीबी दोस्त ज़्यादातर उनके अपने ही समुदाय से हैं।
  • लगभग 64% हिंदुओं ने कहा कि एक “सच्चा भारतीय” होने के लिए हिंदू होना बहुत महत्वपूर्ण है।

यह डेटा दिखाता है कि सहिष्णुता के दावों के बावजूद, भारतीय समाज “अलग-अलग खानों” (silos) में जी रहा है। यह सामाजिक अलगाव ही वह ज़मीन है जिस पर राजनीतिक ध्रुवीकरण की फसल लहलहाती है।

सबसे चिंताजनक: पेशेवरों पर हमला क्यों?

इस ध्रुवीकरण का सबसे खतरनाक पहलू है संस्थागत विश्वास का क्षरण। जब समाज राजनीतिक या धार्मिक आधार पर बँट जाता है, तो वह हर संस्था को शक की निगाह से देखने लगता है। इसका सबसे बुरा असर डॉक्टरों, इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और शिक्षकों पर पड़ रहा है।

आरोप यह है कि “लॉबी” (चाहे वह वाम हो या दक्षिण) जानबूझकर इन पेशेवरों को निशाना बनाती है ताकि आम जनता का व्यवस्था से विश्वास उठ जाए।

केस स्टडी: डॉक्टरों पर हिंसा

भारत में डॉक्टरों के खिलाफ हिंसा एक महामारी बन चुकी है। कोविड-19 के दौरान यह अपने चरम पर थी। लेकिन यह सिर्फ स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी का गुस्सा नहीं है; कई मामलों में इसे सांप्रदायिक या राजनीतिक रंग दिया गया।

डेटा 2: इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA)

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) लंबे समय से इस मुद्दे को उठा रहा है।

  • 2019 में IMA द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि 75% डॉक्टरों ने अपने कार्यस्थल पर किसी न किसी रूप की मौखिक या शारीरिक हिंसा का सामना किया था
  • कोविड-19 के दौरान, डॉक्टरों पर इलाज में भेदभाव करने (धर्म या जाति के आधार पर) के झूठे आरोप लगाकर हमले किए गए। सोशल मीडिया पर ऐसे अनगिनत वीडियो और पोस्ट प्रसारित किए गए, जहाँ डॉक्टरों की निष्ठा पर सवाल उठाए गए।

जब एक मरीज़ अपने डॉक्टर में ‘हिंदू डॉक्टर’ या ‘मुस्लिम डॉक्टर’ देखने लगता है, तो यह ‘हिप्पोक्रेटिक ओथ’ (डॉक्टर की शपथ) की नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास की मौत है। इंजीनियरों द्वारा बनाए गए पुलों या इमारतों को भी इसी सांप्रदायिक चश्मे से देखा जाने लगा है, जहाँ हर तकनीकी विफलता को ‘साजिश’ करार दिया जाता है।

विशेषज्ञ विश्लेषण: यह ‘इको चैंबर’ का प्रभाव है

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक और समाजशास्त्री इस प्रवृत्ति को ‘इको चैंबर इफेक्ट’ (echo chamber effect) का विस्तार मानते हैं।

“जब आप केवल वही सुनते हैं जो आप सुनना चाहते हैं, और बाकी सभी आवाज़ों को ‘दुश्मन’ या ‘बिका हुआ’ मान लेते हैं, तो आप तर्कसंगत नहीं रह जाते। भारत में यही हो रहा है।”

प्रसिद्ध राजनीतिक टिप्पणीकार प्रताप भानु मेहता ने अपने कई लेखों में ‘संस्थागत विश्वास के क्षरण’ (erosion of institutional trust) पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका तर्क है कि जब राजनीतिक दल और मीडिया संस्थान अपनी विश्वसनीयता खो देते हैं, तो यह अविश्वास समाज की हर रग में फैल जाता है अदालतों से लेकर अस्पतालों तक। 

वामपंथी या दक्षिणपंथी लॉबी पर आरोप-प्रत्यारोप इस गहरे संकट का सिर्फ एक लक्षण है। असली बीमारी है संवाद की मृत्यु और विश्वास का टूटना।

वैश्विक सबक: अमेरिका और ब्रिटेन का हश्र

भारत के लिए अमेरिका और ब्रिटेन का उदाहरण एक गंभीर चेतावनी है। इन देशों में ध्रुवीकरण ने क्या किया है, यह जगजाहिर है।

डेटा 3: अमेरिका में ध्रुवीकरण

प्यू रिसर्च सेंटर का डेटा दिखाता है कि अमेरिका में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स के बीच की वैचारिक खाई पिछले दो दशकों में नाटकीय रूप से बढ़ी है।

  • 2023 के एक अध्ययन के अनुसार, अमेरिका में लगभग 60% रिपब्लिकन डेमोक्रेट्स को “नैतिक रूप से भ्रष्ट” मानते हैं, और लगभग 55% डेमोक्रेट्स रिपब्लिकन के बारे में यही राय रखते हैं।
  • यह सिर्फ राजनीतिक मतभेद नहीं है; यह एक-दूसरे के प्रति गहरी “घृणा” (animosity) है।

इस ध्रुवीकरण का परिणाम? 6 जनवरी 2021 को यूएस कैपिटल पर हुआ हमला, नस्लीय तनाव पर हिंसक दंगे, और ‘एंटी-वैक्स’ या ‘QAnon’ जैसी साजिशों में आम लोगों का विश्वास। ब्रिटेन में ब्रेग्जिट ने देश को आर्थिक और सामाजिक रूप से विभाजित कर दिया है, जिससे उबरने में उसे दशकों लग सकते हैं।

भारत, अपनी अपार विविधता के साथ, इस तरह के विभाजनकारी तूफान को झेलने में सक्षम नहीं हो सकता है।

निष्कर्ष: आगे का रास्ता

यह दावा कि ‘अति-वामपंथी लॉबी’ जानबूझकर ‘इस्लामोफोबिया’ का प्रचार कर रही है ताकि देश को तोड़ा जा सके, एक गंभीर आरोप है और यह खुद ध्रुवीकरण की राजनीति का एक हिस्सा हो सकता है।

सच यह है कि ‘वाम’ और ‘दक्षिण’ दोनों ही खेमे अपनी-अपनी विचारधारा को मज़बूत करने के लिए समाज की दरारों का फायदा उठा रहे हैं। जब एक पक्ष ‘इस्लामोफोबिया’ का डर दिखाता है, तो दूसरा पक्ष ‘हिंदू खतरे में है’ का नैरेटिव चलाता है। इस लड़ाई में, तर्क, तथ्य और सबसे महत्वपूर्ण, ‘विश्वास’ की बलि चढ़ जाती है।

डॉक्टरों और इंजीनियरों पर हमला इस बात का संकेत है कि ज़हर अब दिमाग से निकलकर शरीर के महत्वपूर्ण अंगों तक पहुँच गया है। यदि भारत को अमेरिका या ब्रिटेन जैसी आंतरिक अशांति से बचना है, तो समाज के प्रबुद्ध वर्ग, मीडिया और सबसे बढ़कर आम नागरिकों को ‘लॉबी’ के इस खेल को पहचानना होगा।

हमें यह सवाल पूछना बंद करना होगा कि “यह डॉक्टर हिंदू है या मुसलमान?” और यह पूछना शुरू करना होगा कि “क्या यह डॉक्टर काबिल है?”

जिस दिन हम पेशे को पहचान से ऊपर रखना सीख जाएंगे, उसी दिन हम इस ध्रुवीकरण के खेल को हराना शुरू कर देंगे।

संपादकीय नोट: इस लेख में ‘अति-वामपंथी लॉबी’ और ‘इस्लामोफोबिया’ जैसे शब्दों का उपयोग उस विशिष्ट विमर्श के विश्लेषण के लिए किया गया है, जिसका जिक्र प्रस्तावना में है। इन शब्दों की अकादमिक परिभाषा और राजनीतिक उपयोग अत्यंत विवादित और व्यक्तिपरक हो सकते हैं। यह लेख किसी भी दावे का समर्थन या खंडन करने के बजाय, उस विमर्श के सामाजिक प्रभाव का विश्लेषण करता है।

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