NDA का ‘विजय’, ममता का ‘भय’!

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 (Bihar election 2025) के आज आए नतीजों ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को एक ऐतिहासिक और प्रचंड बहुमत दिया है।2 लेकिन इस 'भगवा' लहर से कहीं…

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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 (Bihar election 2025) के आज आए नतीजों ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को एक ऐतिहासिक और प्रचंड बहुमत दिया है।2 लेकिन इस ‘भगवा’ लहर से कहीं ज़्यादा, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए चिंता का विषय इन नतीजों के ‘क्यों’ और ‘कैसे’ में छिपा है। बिहार के अल्पसंख्यक-बहुल सीमांचल क्षेत्र में असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM द्वारा ‘महागठबंधन’ (MGB) के वोटों में निर्णायक सेंधमारी और M-Y (मुस्लिम-यादव) समीकरण का टूटना, 2026 में बंगाल फतह की तैयारी कर रहीं ममता बनर्जी के लिए एक ‘रेड अलर्ट’ है।

मुख्य तथ्य: एक नज़र में

  • NDA की लैंडस्लाइड: बिहार की 243 सीटों में से, NDA (भाजपा, जदयू, लोजपा (रा), हम) ने लगभग 180-200 सीटों पर जीत या निर्णायक बढ़त हासिल कर ली है, जो एग्जिट पोल के अनुमानों से भी कहीं ज़्यादा है।
  • महागठबंधन ध्वस्त: तेजस्वी यादव का ‘M-Y’ समीकरण और कांग्रेस का साथ, NDA के ‘विकास + लाभार्थी’ मॉडल के सामने पूरी तरह विफल रहा। MGB 50 सीटों के आंकड़े के लिए भी संघर्ष करता दिखा।
  • AIMIM का ‘निर्णायक’ खेल: असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने सीमांचल में 6 सीटों (जोकीहाट, अमौर, कोचाधामन सहित) पर जीत दर्ज की या आगे रही।यह 2020 की 5 सीटों से ज़्यादा है। 
  • सीमांचल में MGB की विफलता: 40% से अधिक मुस्लिम आबादी वाले सीमांचल क्षेत्र में, MGB को ‘क्लीन स्वीप’ की उम्मीद थी। लेकिन AIMIM की मौजूदगी ने दर्जनों सीटों पर MGB का खेल बिगाड़ दिया, जिसका सीधा फायदा NDA को मिला। 
  • बंगाल का सीधा कनेक्शन: ये नतीजे ऐसे समय आए हैं जब ममता बनर्जी बंगाल में 2026 के चुनाव से पहले मतदाता सूची के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) को ‘वोटबंदी’ करार देते हुए केंद्र और चुनाव आयोग से सीधी लड़ाई लड़ रही हैं यह वही SIR है जो बिहार में इन चुनावों से ठीक पहले लागू किया गया था।

बिहार 2025 का जनादेश: ‘सुशासन’ और ‘वोट-बिखराव’ की जीत

आज, 14 नवंबर 2025 को, बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने सभी राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया। जहाँ एग्जिट पोल एक करीबी मुकाबले या NDA को हल्की बढ़त का अनुमान लगा रहे थे, वहीं नतीजे एकतरफा NDA लहर में तब्दील हो गए।

दोपहर तक, यह स्पष्ट हो गया कि NDA 180 सीटों का आँकड़ा पार कर रहा है, जो 2020 की 125 सीटों की तुलना में एक बड़ी छलांग है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस जीत के दो मुख्य कारण हैं:

  1. नीतीश-मोदी का ‘कल्याणकारी’ मॉडल: नीतीश कुमार का ‘सुशासन बाबू’ का चेहरा और प्रधानमंत्री मोदी की ‘लाभार्थी’ (welfare) योजनाओं का ज़मीन पर पहुँचना, खासकर महिला मतदाताओं के बीच, एक ‘साइलेंट’ वोट बैंक के रूप में काम कर गया।

  2. विपक्ष का ‘आत्मघाती’ बिखराव: दूसरा और शायद सबसे महत्वपूर्ण कारण, विपक्ष की अपनी रणनीति का विफल होना है।

बंगाल के लिए असली सबक: सीमांचल का ‘वोट-कटवा’ मॉडल

पश्चिम बंगाल, जहाँ 2026 में विधानसभा चुनाव होने हैं और जहाँ की लगभग 30% आबादी मुस्लिम है, के लिए बिहार का यह जनादेश एक केस स्टडी है। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) की जीत काफी हद तक अल्पसंख्यक वोटों के एकमुश्त ध्रुवीकरण पर निर्भर करती है। बिहार ने दिखाया है कि यह ‘एकमुश्त’ वोट बैंक अब टूटने लगा है।

1. आँकड़ों का आईना: AIMIM की सेंधमारी

ताज़ा नतीजों के अनुसार, AIMIM ने सीमांचल क्षेत्र में 2020 के अपने प्रदर्शन को दोहराते हुए 6 सीटों पर बढ़त बना ली है।

  • सीटें जीतीं: जोकीहाट, अमौर, कोचाधामन, बायसी।
  • इसका मतलब: ये वो सीटें हैं जो पारंपरिक रूप से RJD या कांग्रेस की ‘पक्की’ सीटें मानी जाती थीं।

2. ‘द हिंदू’ का विश्लेषण: MGB की हार का ‘माइनॉरिटी’ फैक्टर

‘द हिंदू’ अख़बार के एक ताज़ा विश्लेषण (14 नवंबर, 2025) के अनुसार, AIMIM की सीमांचल में इस वृद्धि ने अल्पसंख्यक वोटों को विभाजित कर दिया, जिसकी सीधी कीमत महागठबंधन को चुकानी पड़ी।

डेटा विश्लेषण: रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी 40% से अधिक थी (मुख्य रूप से सीमांचल में), उनमें से कांग्रेस केवल एक सीट (किशनगंज) पर ही बढ़त बना सकी। RJD और वाम दल, इस क्षेत्र में अपने तमाम दावों के बावजूद, इन मुस्लिम-बहुल सीटों पर जीत हासिल करने में विफल रहे। 

3. M-Y समीकरण का टूटना

RJD का पारंपरिक ‘मुस्लिम-यादव’ (M-Y) समीकरण, जो बिहार की लगभग 30% आबादी को कवर करता है, इस बार पूरी तरह विफल रहा। विश्लेषकों का मानना है कि तेजस्वी यादव इस कोर वोट बैंक से आगे (जैसे EBCs, दलित) नहीं जा पाए। इसके अतिरिक्त, AIMIM ने ‘M’ (मुस्लिम) वोट में स्पष्ट रूप से सेंध लगा दी, जिससे RJD की नींव ही हिल गई। 

ममता की दोहरी चिंता: ‘वोट-कटवा’ और ‘वोटबंदी’

बिहार के ये नतीजे ममता बनर्जी की दो सबसे बड़ी चिंताओं को एक साथ सतह पर लाते हैं।

पहली चिंता: ‘वोट-कटवा’ (AIMIM और ISF)

बिहार में जो भूमिका AIMIM ने निभाई है, वही भूमिका पश्चिम बंगाल में AIMIM और अब्बास सिद्दीकी की ISF (इंडियन सेक्युलर फ्रंट) निभाने की कोशिश कर रही है। 2021 के बंगाल चुनावों में ISF ने TMC को कई सीटों पर नुकसान पहुँचाया था। बिहार 2025 के नतीजों ने यह साबित कर दिया है कि यह ‘वोट-स्प्लिटर’ मॉडल भाजपा के लिए कितना फायदेमंद हो सकता है। यह TMC के ‘अभेद्य’ अल्पसंख्यक किले में सेंध लगाने का एक सफल ‘ब्लूप्रिंट’ पेश करता है।

दूसरी चिंता: ‘वोटबंदी’ (SIR मतदाता सूची संशोधन)

इससे भी बड़ी और तात्कालिक चिंता वह प्रशासनिक लड़ाई है जिसे ममता बनर्जी लड़ रही हैं। केंद्र और चुनाव आयोग (EC) ने बंगाल में 2026 के चुनावों से पहले मतदाता सूचियों के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) का आदेश दिया है। ममता बनर्जी इसे ‘वोटबंदी’ (Votebandi) करार दे चुकी हैं।

  • ममता का आरोप: उनका आरोप है कि यह SIR “जानबूझकर असली मतदाताओं, खासकर गरीबों और अल्पसंख्यकों के नाम हटाने” की एक भाजपा की साजिश है।

  • बिहार का ‘प्रूफ’: यह SIR प्रक्रिया हाल ही में बिहार में सफलतापूर्वक लागू की गई थी। ममता बनर्जी ने 10 नवंबर, 2025 को इस पर सीधी टिप्पणी की थी।

आधिकारिक उद्धरण: “आप यह (SIR) बिहार में कर सकते हैं क्योंकि आप वहां से बच निकले, लेकिन बंगाल में नहीं, जहां हम हर कदम पर आपसे सवाल करेंगे… आप लोकतंत्र को ध्वस्त नहीं कर सकते।”

— ममता बनर्जी, मुख्यमंत्री, पश्चिम बंगाल (जैसा कि इंडिया टुडे, 10 नवंबर, 2025 को रिपोर्ट किया गया)

आज बिहार में MGB की हार ने ममता की इस चिंता को और गहरा कर दिया है। यह दर्शाता है कि विपक्ष (MGB) बिहार में SIR की प्रक्रिया को राजनीतिक या ज़मीनी स्तर पर चुनौती देने में विफल रहा।

निष्कर्ष: बंगाल 2026 की ‘बिसात’ बिछी

बिहार 2025 का चुनाव सिर्फ एक राज्य का नतीजा नहीं है; यह 2026 में बंगाल के लिए एक ‘चेतावनी’ है। यह दिखाता है कि NDA के पास अब अल्पसंख्यक-बहुल क्षेत्रों में भी जीत का एक ‘त्रि-आयामी’ फार्मूला है:

  1. कल्याणकारी योजनाएं (लाभार्थी वर्ग बनाना)।
  2. विपक्षी एकता का अभाव (कांग्रेस का ‘ड्रैग फैक्टर’ बनना)।
  3. पहचान-आधारित ‘वोट-स्प्लिटर’ (जैसे AIMIM) को उभरने देना।

ममता बनर्जी के लिए, संदेश स्पष्ट है: 2026 की लड़ाई केवल भाजपा के खिलाफ नहीं है। यह लड़ाई ‘वोट-कटवा’ ताकतों, ‘इंडिया’ गठबंधन के भीतर की कमजोरियों (जैसे कांग्रेस का प्रदर्शन) और चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं के प्रशासनिक दांव-पेंच के खिलाफ भी है। बिहार ने आज दिखा दिया है कि यह लड़ाई कितनी कठिन होने वाली है।

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