फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली की सड़कें जिस आग में झुलसी थीं, उसकी आंच 2025 में भी ठंडी नहीं पड़ी है। सुप्रीम कोर्ट में चल रही उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत पर बहस ने एक बार फिर उस सवाल को जिंदा कर दिया है जिसे अक्सर दबी जुबान में पूछा जाता है: क्या राज्य ने दंगाइयों से ‘बदला’ ले लिया है? 5 साल बाद, दिल्ली पुलिस की “साजिश” (Conspiracy) थ्योरी और अदालतों में चल रही जिरह यह बताती है कि यह मामला अब केवल दंगों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ‘संप्रभुता पर हमले’ और ‘बदले’ (Retribution) के बीच की एक लंबी कानूनी लड़ाई बन चुका है।
Quick Take: 5 साल बाद कहां है केस?
- 5 साल की कैद: उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे मुख्य आरोपी पिछले 5 वर्षों से जेल में हैं। सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिका पर अभी भी तीखी बहस जारी है।
- ‘बांग्लादेश’ जैसा प्लान: दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दावा किया है कि 2020 के दंगे “स्वतःस्फूर्त” नहीं थे, बल्कि 2024 के बांग्लादेश तख्तापलट जैसी बड़ी साजिश की रिहर्सल थे।
- सजा का दौर: कड़कड़डूमा कोर्ट ने सितंबर 2025 में दंगों और आगजनी के लिए 6 लोगों को दोषी ठहराया है, जो छोटे स्तर पर न्याय की शुरुआत है।
- पुलिस का तर्क: “बौद्धिक आतंकवादी” (Intellectual Terrorists) जमीनी दंगाइयों से ज्यादा खतरनाक हैं यह दिल्ली पुलिस का नया कानूनी तर्क है।
‘बदला’ या ‘इंसाफ’: क्या है सरकार का संदेश?
आम तौर पर न्याय प्रणाली ‘सुधार’ पर काम करती है, लेकिन 2020 के दिल्ली दंगों के मामले में राज्य का रुख स्पष्ट रूप से ‘जीरो टॉलरेंस’ और ‘कठोर दंड’ का रहा है। गृह मंत्री अमित शाह ने कई मंचों पर स्पष्ट किया है कि उपद्रवियों के खिलाफ कार्रवाई “निर्मम” (Ruthless) होगी। 2025 में, जब आरोपी 5 साल बिना ट्रायल पूरा हुए जेल में बिता चुके हैं, तो कई विश्लेषक इसे ‘प्रक्रिया ही सजा है’ (Process is the punishment) के रूप में देख रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट में ‘साजिश’ की नई परिभाषा
नवंबर 2025 के तीसरे सप्ताह में सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और एएसजी एस.वी. राजू ने कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने जजों के सामने तर्क दिया कि:
“यह केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं था जो हिंसक हो गया। यह भारत की संप्रभुता पर सुनियोजित हमला था। 2024 में बांग्लादेश में जो हुआ, वैसी ही पटकथा दिल्ली के लिए 2020 में लिखी गई थी, लेकिन वह विफल रही।”
यह पहली बार है जब अभियोजन पक्ष ने आधिकारिक तौर पर पड़ोसी देश की हालिया अस्थिरता (बांग्लादेश 2024) का उदाहरण देकर आरोपियों की जमानत का विरोध किया है।
नवीनतम डेटा: कड़कड़डूमा कोर्ट से क्या निकला?
जबकि “बड़ी साजिश” (Larger Conspiracy – FIR 59/2020) का मामला अभी भी तकनीकी पेंचों में फंसा है, जमीनी हिंसा के मामलों में फैसले आने लगे हैं।
| विवरण | स्थिति (नवंबर 2025 तक) |
| कुल मौतें | 53 |
| गिरफ्तारियां | 1800+ (विभिन्न FIRs में) |
| मुख्य साजिश का केस | चार्ज फ्रेमिंग और जमानत के चरण में (UAPA) |
| हालिया सजा | सितंबर 2025 में 6 लोगों को दंगा और आगजनी के लिए दोषी ठहराया गया। |
| बरी (Acquittals) | कई मामलों में सबूतों के अभाव में आरोपी बरी भी हुए हैं। |
‘बौद्धिक आतंकवाद’ बनाम ‘नागरिक अधिकार’
इस पूरे मामले का सबसे विवादित पहलू UAPA (Unlawful Activities Prevention Act) का उपयोग है। एएसजी एस.वी. राजू ने सुप्रीम कोर्ट में एक चौंकाने वाला तर्क दिया:
“तथाकथित बुद्धिजीवी (Intellectuals) जमीनी स्तर के आतंकवादियों से अधिक खतरनाक हैं। वे राज्य की सब्सिडी पर डॉक्टर-इंजीनियर बनते हैं और फिर समाज को बांटने की साजिश रचते हैं।” बचाव पक्ष के वकील, त्रिदीप पेस ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कहा कि पुलिस के पास “कोई भौतिक सबूत नहीं है, केवल गवाहों के बयान हैं जो घटना के 11 महीने बाद दर्ज किए गए।” बचाव पक्ष का कहना है कि 5 साल की कैद बिना दोष सिद्धि के, अपने आप में अन्याय है।
पीड़ितों का दर्द: 5 साल बाद भी सवाल वही
जाफराबाद और शिव विहार की गलियों में, जहां 2020 में सबसे ज्यादा हिंसा हुई थी, लोग अब भी “इंसाफ” की बाट जोह रहे हैं। पीड़ितों के लिए, ‘बदला’ एक राजनीतिक शब्द हो सकता है, लेकिन ‘न्याय’ उनकी जरूरत है। मुआवजे की फाइलें बंद हो चुकी हैं, लेकिन कई परिवार अभी भी अदालतों के चक्कर काट रहे हैं।
एक स्थानीय दुकानदार, जिनकी दुकान 2020 में जला दी गई थी, ने नाम न छापने की शर्त पर कहा: “नेताओं के लिए यह हिंदू-मुस्लिम का मुद्दा है, हमारे लिए यह रोजी-रोटी का था। 5 साल हो गए, कुछ लोग जेल में हैं, लेकिन मेरा नुकसान तो वापस नहीं आया।”
निष्कर्ष: क्या आगे कोई बड़ा फैसला आएगा?
2025 का अंत आते-आते, सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर हैं। यदि शीर्ष अदालत उमर खालिद या शरजील इमाम को जमानत देती है, तो यह पुलिस की “गहरी साजिश” वाली थ्योरी पर सवालिया निशान होगा। वहीं, अगर जमानत खारिज होती है, तो यह संदेश साफ होगा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में न्यायपालिका भी ‘कठोरता’ के पक्ष में है।
भारत ‘बदला’ ले रहा है या नहीं, यह बहस का विषय हो सकता है। लेकिन इतना तय है कि दिल्ली दंगों की गूंज ने भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली (Criminal Justice System) की दिशा बदल दी है जहां ‘बेल’ (Bail) अब अपवाद है और ‘जेल’ नियम बन गया है।
