साजिशों का ड्रैगन vs भारत का ‘न्यू इंडिया’

चीन और भारत के बीच सीमा विवाद का केंद्र बिंदु अब पूरी तरह से Arunachal Pradesh (अरुणाचल प्रदेश) पर केंद्रित हो गया है। हाल ही में शंघाई हवाई अड्डे पर…

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चीन और भारत के बीच सीमा विवाद का केंद्र बिंदु अब पूरी तरह से Arunachal Pradesh (अरुणाचल प्रदेश) पर केंद्रित हो गया है। हाल ही में शंघाई हवाई अड्डे पर अरुणाचल की एक भारतीय नागरिक के साथ हुए दुर्व्यवहार और बीजिंग द्वारा जारी किए गए स्थानों के ‘मानकीकृत नामों’ की चौथी सूची ने कूटनीतिक तनाव को चरम पर पहुंचा दिया है।1 जहां चीन “मनोवैज्ञानिक युद्ध” (Psychological Warfare) का सहारा ले रहा है, वहीं भारत ने सेला टनल (Sela Tunnel) जैसी सामरिक परियोजनाओं और अमेरिकी समर्थन के साथ अपनी स्थिति को अभेद्य बना लिया है।

महत्वपूर्ण तथ्य: एक नज़र में 

  • ताज़ा विवाद: शंघाई हवाई अड्डे पर अरुणाचल की भारतीय महिला को हिरासत में लिया गया; चीन ने उनके पासपोर्ट को अमान्य बताते हुए दावा किया कि अरुणाचल चीन का हिस्सा है।

  • चीन की नामकरण नीति: चीन के नागरिक मामलों के मंत्रालय ने अरुणाचल प्रदेश में 30 स्थानों के लिए नए चीनी नामों की चौथी सूची जारी की है। इससे पहले 2017, 2021 और 2023 में सूचियां जारी की गई थीं।

  • भारत का जवाब: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 13,000 फीट की ऊंचाई पर निर्मित सेला टनल (Sela Tunnel) का उद्घाटन, जो तवांग तक हर मौसम में सेना की पहुंच सुनिश्चित करता है।

  • अंतर्राष्ट्रीय समर्थन: अमेरिकी सीनेट ने एक प्रस्ताव पारित कर मैकमोहन रेखा (McMahon Line) को अंतर्राष्ट्रीय सीमा के रूप में मान्यता दी है, जो चीन के दावों को खारिज करता है।

  • सैन्य स्थिति: पूर्वी सेक्टर में भारत ने अपनी मारक क्षमता बढ़ाई है; राफेल जेट्स और S-400 मिसाइल सिस्टम की तैनाती की खबरें हैं।

संदर्भ: ‘जंगनान’ (Zangnan) का मिथक और ज़मीनी हकीकत

चीन अरुणाचल प्रदेश को “दक्षिणी तिब्बत” या “जंगनान” (Zangnan) कहता है और इसे अपने क्षेत्र के रूप में दावा करता है। हालांकि, नई दिल्ली ने हमेशा इन दावों को “बेतुका” (Ludicrous) बताते हुए खारिज किया है। वर्तमान तनाव केवल नक्शों तक सीमित नहीं है; यह संप्रभुता और सामरिक वर्चस्व की लड़ाई है।

विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने हालिया घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा:

“अरुणाचल प्रदेश भारत का एक अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा। चीन द्वारा नए नाम गढ़ने या पासपोर्ट को नकारने से यह ‘निर्विवाद वास्तविकता’ (Indisputable Reality) नहीं बदलेगी।” 

क्या हुआ है? शंघाई की घटना और नाम बदलने की राजनीति

नवंबर 2025 के इस सप्ताह में तनाव तब बढ़ गया जब अरुणाचल प्रदेश की एक निवासी को शंघाई पुडोंग अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर चीनी आव्रजन अधिकारियों द्वारा यह कहकर रोक लिया गया कि उनका भारतीय पासपोर्ट “वैध नहीं” है क्योंकि वह चीन के हिस्से (अरुणाचल) से आती हैं। यह घटना चीन की उस दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है जिसे विशेषज्ञ “सलामी स्लाइसिंग” (Salami Slicing) और “कानूनी युद्ध” (Lawfare) का मिश्रण मानते हैं।

इसके अलावा, अप्रैल 2024 में चीन ने अरुणाचल के 30 स्थानों के नाम बदल दिए थे, जिनमें 11 रिहायशी इलाके, 12 पहाड़, 4 नदियां और 1 झील शामिल थीं। यह बीजिंग की 2022 के उस भूमि सीमा कानून के तहत किया गया, जिसका उद्देश्य सीमाओं पर चीन की संप्रभुता को “मानकीकृत” करना है।

भारत का ‘कंक्रीट’ जवाब: सेला टनल 

चीन के कागजी दावों का जवाब भारत ने ठोस इंफ्रास्ट्रक्चर से दिया है। 9 मार्च, 2024 को प्रधानमंत्री मोदी द्वारा राष्ट्र को समर्पित सेला टनल इस क्षेत्र में गेम-चेंजर साबित हुई है।

सेला टनल के सामरिक आंकड़े:

  1. ऊंचाई: 13,000 फीट (दुनिया की सबसे लंबी बाइ-लेन सुरंग इतनी ऊंचाई पर)।

  2. लागत: ₹825 करोड़।

  3. महत्व: यह 1962 के युद्ध के दौरान एक कमजोर बिंदु रहे सेला दर्रे (Sela Pass) के नीचे से गुजरती है। अब बर्फबारी के बावजूद तवांग और चीन सीमा (LAC) तक भारतीय सेना की आवाजाही साल के 365 दिन संभव है।

  4. सैन्य लाभ: यह सुरंग भारी तोपखाने, जैसे कि बोफोर्स तोपों और टी-90 टैंकों की त्वरित तैनाती की अनुमति देती है।

रक्षा विशेषज्ञ (सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल) के अनुसार:

“सेला टनल ने चीन की रणनीतिक बढ़त को खत्म कर दिया है। पहले वे सर्दियों में तवांग के कट जाने का इंतजार करते थे, लेकिन अब भारतीय सेना किसी भी मौसम में 1 घंटे के भीतर रिस्पॉन्स कर सकती है।” (स्रोत: रक्षा विश्लेषण)

विशेषज्ञ विश्लेषण: तवांग (Tawang) ही केंद्र क्यों?

पूरा विवाद अरुणाचल प्रदेश से जुड़ा है, लेकिन इसकी आत्मा तवांग में बसती है। तवांग मठ (Tawang Monastery) तिब्बती बौद्ध धर्म का दूसरा सबसे बड़ा मठ है।

  • दलाई लामा का उत्तराधिकार: चीन को डर है कि वर्तमान दलाई लामा का उत्तराधिकारी तवांग से चुना जा सकता है, जिससे तिब्बत पर चीन की पकड़ कमजोर हो जाएगी।
  • इतिहास: 1959 में दलाई लामा ने तिब्बत से भागकर तवांग के रास्ते ही भारत में शरण ली थी।

  • चीन की चिंता: यदि तवांग भारत के पास रहता है (जो कि है), तो तिब्बती बौद्ध धर्म का नियंत्रण बीजिंग के हाथ से पूरी तरह फिसल सकता है।

अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया और अमेरिका का रुख

चीन के लिए सबसे बड़ा कूटनीतिक झटका संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) की ओर से आया है। अमेरिकी सीनेट ने 2024 में एक द्विदलीय प्रस्ताव (Bipartisan Resolution) के माध्यम से मैकमोहन रेखा को मान्यता दी।

अमेरिकी विदेश विभाग का बयान:

“अमेरिका अरुणाचल प्रदेश को भारतीय क्षेत्र के रूप में मान्यता देता है और हम वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर किसी भी एकतरफा प्रयास या घुसपैठ का दृढ़ता से विरोध करते हैं।” 

यह पहली बार है जब किसी महाशक्ति ने इतने खुले तौर पर अरुणाचल पर भारत के दावों का समर्थन किया है, जिससे बीजिंग कूटनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ गया है।

लद्दाख बनाम अरुणाचल: दो अलग मोर्चे

हालाँकि अक्टूबर 2024 में भारत और चीन पूर्वी लद्दाख (डेपसांग और डेमचोक) में गश्त (patrolling) को लेकर एक समझौते पर पहुंचे थे, लेकिन यह समझना महत्वपूर्ण है कि अरुणाचल प्रदेश (पूर्वी सेक्टर) में स्थिति अभी भी तनावपूर्ण है।

विशेषता पश्चिमी सेक्टर (लद्दाख) पूर्वी सेक्टर (अरुणाचल प्रदेश)
विवाद की प्रकृति वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) की धारणा में अंतर चीन पूरे राज्य पर दावा करता है (मैकमोहन रेखा को नकारता है)
हालिया स्थिति गश्त बहाली समझौता (अक्टूबर 2024) चीन द्वारा नाम बदलना, नागरिकों को वीजा नत्थी (stapled visa) करना
इंफ्रास्ट्रक्चर दौलत बेग ओल्डी रोड सेला टनल, फ्रंटियर हाईवे (निर्माणाधीन)

निष्कर्ष: आगे क्या?

चीन की आक्रामकता (Aggression) केवल सीमा विस्तार तक सीमित नहीं है; यह भारत के धैर्य और तैयारी की परीक्षा है। सेला टनल और वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम (Vibrant Villages Programme) के जरिए भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह 1962 वाला भारत नहीं है।

आने वाले दिनों में, हमें चीन द्वारा “ग्रे-ज़ोन वारफेयर” (Grey-zone warfare) के और उदाहरण देखने को मिल सकते हैं जैसे साइबर हमले या ब्रह्मपुत्र नदी (यारलुंग त्सांगपो) पर बड़े बांधों का निर्माण। लेकिन कूटनीतिक और सैन्य दोनों मोर्चों पर भारत की “आक्रामक रक्षा” (Aggressive Defence) नीति ने ड्रैगन को बैकफुट पर धकेल दिया है।

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