क्या आपके बच्चे के स्कूल में भगवद गीता के श्लोक पढ़ाए जा रहे हैं? क्या आपको यह चिंता है कि यह केवल “पढ़ाई” है या किसी विशिष्ट धर्म की “पूजा”? हाल के वर्षों में, गुजरात से लेकर कर्नाटक तक, कई राज्य सरकारों ने स्कूलों में भगवद गीता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने का प्रस्ताव रखा है। इसने एक पुरानी बहस को फिर से जन्म दिया है: धर्मनिरपेक्ष भारत के स्कूलों में धार्मिक ग्रंथों की क्या जगह है?
एक शिक्षा नीति विश्लेषक (Education Policy Analyst) के रूप में, मैंने पिछले कुछ वर्षों में दर्जनों अदालती फैसलों और सरकारी सर्कुलर (Government Circulars) का गहन अध्ययन किया है। मेरा उद्देश्य आपको डराना या किसी पक्ष में झुकाना नहीं, बल्कि आपको संवैधानिक सच बताना है।
इस लेख में, हम भावनाओं को परे रखकर केवल तथ्यों, कानून और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के आधार पर जानेंगे कि क्या स्कूल में गीता पढ़ाना कानूनी है या नहीं।
संविधान क्या कहता है? (The Constitutional Framework)
भारत एक धर्मनिरपेक्ष (Secular) देश है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि धर्म का अस्तित्व नहीं है। स्कूलों में धर्म की स्थिति को समझने के लिए हमें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 28 (Article 28) को बहुत ध्यान से समझना होगा।
मैंने अपने शोध में पाया कि अधिकतर विवाद अनुच्छेद 28 की गलत व्याख्या के कारण होते हैं। यहाँ आसान भाषा में नियम दिए गए हैं:
1. पूर्णतः सरकारी स्कूल (Fully State-Funded Schools)
संविधान का अनुच्छेद 28(1) स्पष्ट रूप से कहता है:
“राज्य निधि (State Fund) से पूर्णतः पोषित किसी भी शिक्षण संस्थान में कोई भी ‘धार्मिक शिक्षा’ (Religious Instruction) नहीं दी जाएगी।”
इसका मतलब है कि अगर कोई स्कूल 100% सरकारी पैसे से चलता है (जैसे केंद्रीय विद्यालय या सरकारी जिला स्कूल), तो वहाँ किसी भी धर्म की पूजा, अर्चना या कर्मकांड अनिवार्य रूप से नहीं कराए जा सकते।
2. सहायता प्राप्त और मान्यता प्राप्त स्कूल (Aided & Recognized Schools)
यह वह जगह है जहाँ मामला पेचीदा होता है। अनुच्छेद 28(3) कहता है कि अगर कोई स्कूल सरकार से मदद (Aid) ले रहा है या सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है, तो वह किसी छात्र को धार्मिक शिक्षा में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।
नियम: धार्मिक गतिविधि हो सकती है, लेकिन छात्र (या अगर वह नाबालिग है, तो उसके माता-पिता) की सहमति (Consent) अनिवार्य है।
‘पढ़ाई’ बनाम ‘पूजा’: सुप्रीम कोर्ट का नजरिया
यही इस पूरे विवाद का मुख्य बिंदु है। क्या गीता पढ़ाना “धार्मिक शिक्षा” (Religious Instruction) है या “नैतिक शिक्षा/दर्शन” (Moral Education/Philosophy)?
कानूनी इतिहास में गोता लगाने पर, मुझे 2002 का अरुणा रॉय बनाम भारत संघ (Aruna Roy vs Union of India) का ऐतिहासिक सुप्रीम कोर्ट का फैसला मिला। यह फैसला आज भी स्कूलों के लिए गाइडलाइन का काम करता है।
सुप्रीम कोर्ट का तर्क:
कोर्ट ने माना कि “धर्म के बारे में अध्ययन करना” (Study of Religion) और “धार्मिक शिक्षा” (Religious Instruction) में अंतर है।
Religious Instruction: इसका मतलब है किसी विशिष्ट धर्म के रीति-रिवाजों, पूजा पद्धतियों और डोग्मा (Dogma) को सिखाना और यह कहना कि यही एकमात्र सत्य है।
Value-based Education: सभी धर्मों के अच्छे विचारों, नैतिकता और दर्शन को पढ़ाना।
फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भगवद गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह भारतीय दर्शन (Indian Philosophy) और जीवन जीने की कला का एक हिस्सा है। इसलिए, इसे नैतिक शिक्षा के हिस्से के रूप में पढ़ाने पर कोई संवैधानिक रोक नहीं है, बशर्ते इसे “पूजा” के रूप में न थोपा जाए।
मेरा व्यक्तिगत विश्लेषण: शैक्षिक पाठ्यक्रम (Curriculum) का विश्लेषण करते समय मैंने देखा कि जब गीता को साहित्य या दर्शन के रूप में पढ़ाया जाता है, तो यह अनुच्छेद 28 का उल्लंघन नहीं करता। लेकिन जैसे ही इसे प्रार्थना सभा में अनिवार्य ‘जाप’ बनाया जाता है, यह कानूनी दायरे में चुनौती देने योग्य हो जाता है।
नई शिक्षा नीति (NEP 2020) और भारतीय ज्ञान प्रणाली
वर्ष 2020 में भारत सरकार ने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) लागू की। इस नीति का एक प्रमुख स्तंभ है ‘Indian Knowledge System’ (भारतीय ज्ञान प्रणाली)।
NEP 2020 स्पष्ट रूप से कहती है कि छात्रों को भारत की प्राचीन समृद्ध विरासत, तर्कशास्त्र और दर्शन से परिचित कराया जाना चाहिए। इसमें संस्कृत भाषा और प्राचीन ग्रंथों के संदर्भ शामिल हैं।
क्या यह बदलाव केवल गीता के लिए है?
नहीं। नीति के अनुसार, इसमें पंचतंत्र की कहानियाँ, जातक कथाएँ, और अन्य भारतीय दार्शनिक ग्रंथ भी शामिल हो सकते हैं। सरकार का तर्क है कि गीता के कर्म योग और निष्काम कर्म के सिद्धांत “प्रबंधन” (Management) और “मनोविज्ञान” (Psychology) के छात्रों के लिए महत्वपूर्ण केस स्टडी हैं।
क्या विरोध सही है?
आलोचकों का कहना है कि बहु-धार्मिक देश में केवल एक धर्म के ग्रंथ को प्रमुखता देना संविधान की भावना के खिलाफ हो सकता है। हालाँकि, कानूनी तौर पर जब तक इसे “शैक्षिक सामग्री” के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, इसे रोकना कठिन है।
प्राइवेट बनाम सरकारी स्कूल: नियम कहाँ अलग हैं?
अभिभावक के रूप में, आपको यह जानना चाहिए कि आपके बच्चे का स्कूल किस श्रेणी में आता है:
| स्कूल का प्रकार | क्या गीता अनिवार्य की जा सकती है? | कानूनी स्थिति |
| सरकारी स्कूल | नहीं | अनुच्छेद 28(1) के तहत धार्मिक निर्देश पूरी तरह निषिद्ध हैं। (हालांकि, दर्शन के रूप में पढ़ाया जा सकता है)। |
| प्राइवेट (अनएडेड) | हाँ (कुछ शर्तों पर) | प्राइवेट स्कूल अपने नियम बना सकते हैं, लेकिन RTE Act और माता-पिता की सहमति का ध्यान रखना होगा। |
| अल्पसंख्यक संस्थान | हाँ | अनुच्छेद 30 के तहत अल्पसंख्यक (जैसे मदरसे या कॉन्वेंट) अपने धर्म की शिक्षा दे सकते हैं। |
हालिया कानूनी लड़ाइयाँ: गुजरात और कर्नाटक
हाल ही में गुजरात सरकार ने कक्षा 6 से 12 तक गीता के मूल्यों को पाठ्यक्रम में शामिल करने का निर्णय लिया। इसके खिलाफ हाई कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) भी दाखिल हुई।
अदालतों का रुख:
अब तक, अदालतों ने गीता को पाठ्यक्रम में शामिल करने पर पूर्ण प्रतिबंध (Stay) लगाने से इनकार किया है। जजों का तर्क अक्सर यही रहा है कि “नैतिक मूल्यों” को धर्म के साथ भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए। कर्नाटक में भी, शिक्षा मंत्री ने स्पष्ट किया कि गीता को नैतिक विज्ञान (Moral Science) के हिस्से के रूप में पेश किया जाएगा, न कि धार्मिक पाठ के रूप में।
माता-पिता के अधिकार: यदि आप सहमत नहीं हैं तो क्या करें?
यह लेख का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि आपको लगता है कि स्कूल शिक्षा की आड़ में “धर्मांतरण” या “पूजा” करवा रहा है, तो आपके पास क्या अधिकार हैं?
Opt-Out का अधिकार: अनुच्छेद 28(3) आपको यह शक्ति देता है कि आप अपने बच्चे को किसी भी धार्मिक प्रार्थना या क्लास से बाहर रख सकते हैं। स्कूल बच्चे को दंडित नहीं कर सकता।
लिखित शिकायत: आप स्कूल प्रबंधन समिति (SMC) को लिखित में दे सकते हैं कि यह गतिविधि आपके धार्मिक विश्वासों के खिलाफ है।
RTE का सहारा: शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) किसी भी प्रकार के शारीरिक या मानसिक उत्पीड़न (धार्मिक दबाव सहित) को रोकता है।
प्रो टिप: मेरा सुझाव है कि भावनात्मक होने के बजाय, स्कूल प्रशासन से सिलेबस की कॉपी मांगें। देखें कि क्या गीता को ‘साहित्य’ की तरह पढ़ाया जा रहा है या ‘धर्मशास्त्र’ की तरह। तथ्यों के साथ बात करना हमेशा प्रभावी होता है।
निष्कर्ष: क्या यह पढ़ाई है या पूजा?
अंततः, स्कूल में गीता “पढ़ाई” है या “पूजा”, यह इस बात पर निर्भर करता है कि इसे कैसे पढ़ाया जा रहा है।
- यदि शिक्षक श्लोकों का अर्थ, व्याकरण और दार्शनिक महत्व समझा रहे हैं, तो यह शिक्षा है।
- यदि छात्रों को हाथ जोड़कर, आंखें बंद करके श्लोक रटने और इसे पवित्र मानने के लिए बाध्य किया जा रहा है, तो यह पूजा के करीब है और सरकारी स्कूलों में चुनौती दी जा सकती है।
एक जागरूक नागरिक के रूप में, हमें भारतीय संस्कृति के सम्मान और संविधान के धर्मनिरपेक्ष ढांचे के बीच संतुलन समझना होगा। ज्ञान का स्वागत होना चाहिए, लेकिन थोपे गए विश्वास का नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1: क्या प्राइवेट स्कूल सुबह की प्रार्थना में गीता का पाठ अनिवार्य कर सकते हैं?
Ans: प्राइवेट स्कूल अपनी नीतियां बना सकते हैं, लेकिन संविधान के अनुसार, यदि माता-पिता आपत्ति जताते हैं, तो स्कूल बच्चे को मजबूर नहीं कर सकता।
Q2: क्या गीता पढ़ना किसी विशेष धर्म को बढ़ावा देना है?
Ans: सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, गीता भारतीय दर्शन का हिस्सा है। इसे पढ़ाना धर्म को बढ़ावा देना नहीं माना जाता, जब तक कि इसे पूजा की तरह न कराया जाए।
Q3: क्या मैं अपने बच्चे को गीता की क्लास से हटा सकता हूँ?
Ans: हाँ, अनुच्छेद 28(3) के तहत आपको यह संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।
Q4: नई शिक्षा नीति (NEP) में और कौन से ग्रंथ शामिल हैं?
Ans: NEP में वेदों, उपनिषदों, पालि साहित्य और अन्य भारतीय प्राचीन ज्ञान स्रोतों के संदर्भ शामिल करने की बात कही गई है।
