कोलकाता के ऐतिहासिक ब्रिगेड परेड ग्राउंड में ‘लक्ष कंठे गीता पाठ’ (Laksha Kanthe Gita Path) का आयोजन हुआ। इसका मकसद शांति और अध्यात्म का संदेश देना था। हालांकि, इस भव्य आयोजन के बाद एक वीडियो वायरल हो गया है। इस वीडियो ने पूरे बंगाल में नई बहस छेड़ दी है। वीडियो में भीड़ एक गरीब चिकन पैटी विक्रेता को पीट रही है। उसका नाम शेख रियाजुल है। इस घटना ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। क्या धर्म की रक्षा के नाम पर किसी की रोजी-रोटी छीनना सही है? इसके अलावा, क्या हमारे शास्त्र वास्तव में मछली-मांस बेचने पर हिंसा की अनुमति देते हैं?
विवाद की जड़: उस दिन क्या हुआ था?
रविवार, 7 दिसंबर 2025 को कोलकाता के मैदान में लाखों लोग जमा थे। वे ‘सनातन संस्कृति संसद’ द्वारा आयोजित गीता पाठ के लिए आए थे। भीड़-भाड़ के बीच, 50 वर्षीय शेख रियाजुल भी वहां मौजूद थे। वे अपनी साइकिल पर चिकन और वेज पैटी बेच रहे थे।
वायरल वीडियो की सच्चाई
सोशल मीडिया पर 8 दिसंबर को एक वीडियो सामने आया। इसमें कुछ युवक रियाजुल को घेर लेते हैं। इन युवकों ने माथे पर तिलक लगाया हुआ था। दरअसल, वे रियाजुल पर चिल्ला रहे थे। उनका कहना था, “यहाँ गीता पाठ हो रहा है। तुम यहाँ मांस क्यों बेच रहे हो?” इसके बाद, युवकों ने उसे थप्पड़ मारे। उन्होंने उसे कान पकड़कर उठक-बैठक भी लगवाई। अंत में, उन्होंने रियाजुल की सारी पैटी जमीन पर फेंक दीं। उन्हें पैरों से कुचल दिया गया।
पीड़ित का बयान
रियाजुल पिछले 22 वर्षों से इसी मैदान में पैटी बेच रहे हैं। उन्होंने मीडिया को अपना दर्द बताया। रियाजुल ने कहा, “मैं सालों से यहाँ हर रैली में आता हूँ। मुझे नहीं पता था कि आज मना है। अगर वे प्यार से कहते, तो मैं चला जाता।”
शास्त्र क्या कहते हैं? (Fact Check)
भीड़ ने “धर्म” के नाम पर यह हिंसा की। लेकिन, क्या शास्त्र इसका समर्थन करते हैं? वरिष्ठ धर्माचार्यों ने इस पर अपनी राय दी है। उनके अनुसार, स्थिति वैसी नहीं है जैसा वीडियो में दिखाया गया। आइए, इसे विस्तार से समझते हैं।
1. गीता और भोजन का नियम
भगवान कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 17) में भोजन के बारे में बताया है। उन्होंने भोजन को तीन भागों में बांटा है।
- सात्विक: यह आयु और बुद्धि बढ़ाता है। जैसे- दूध और फल।
- राजसिक: यह बहुत तीखा या खट्टा होता है।
- तामसिक: यह बासी या अपवित्र होता है। मांस को अक्सर तामसिक माना जाता है।
विश्लेषण:
गीता “तामसिक” भोजन से बचने की सलाह देती है। इसका उद्देश्य मन को शुद्ध रखना है। तथापि, गीता यह कहीं नहीं कहती कि तामसिक भोजन बेचने वाले को पीटा जाए। इसके विपरीत, गीता का मूल संदेश ‘अहिंसा’ है। निहत्थे वेंडर को पीटना गीता के खिलाफ है।
2. पूजा स्थल और पवित्रता
हिंदू मंदिरों के गर्भगृह में मांसाहार वर्जित होता है। यह पवित्रता के नियमों के तहत आता है।
लेकिन, ब्रिगेड परेड ग्राउंड एक सार्वजनिक मैदान है। यह कोई मंदिर नहीं है। वहां हजारों लोग रोज आते-जाते हैं। शास्त्रों में सार्वजनिक रास्तों पर ऐसी रोक का जिक्र नहीं है।
मनुस्मृति का संदर्भ
मनुस्मृति (5.56) में भी स्पष्ट लिखा है। मनु कहते हैं कि मांस खाने में कोई नैसर्गिक दोष नहीं है। यह प्राणियों की प्रवृत्ति है। हालांकि, इसे छोड़ना बेहतर है। यहाँ भी ‘त्याग’ को श्रेष्ठ बताया गया है। किसी को ‘दंड’ देने का अधिकार भीड़ को नहीं है।
3. बंगाल की अनूठी संस्कृति
बंगाल की हिंदू परंपरा उत्तर भारत से अलग है। यहाँ शाक्त परंपरा (देवी पूजा) प्रबल है। इसमें मछली और मांस को ‘महाप्रसाद’ माना जाता है। मिसाल के तौर पर, कालीघाट मंदिर में बलि की परंपरा आज भी है।
एक वरिष्ठ पुरोहित ने इस पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा, “बंगाल में मछली शुभ मानी जाती है। गीता पाठ एक वैष्णव अनुष्ठान है। वहां शाकाहारी होना जरूरी है। लेकिन, इसे पूरे मैदान पर थोपना गलत है।”
आधिकारिक बयान और प्रतिक्रियाएं
इस घटना पर राजनीति भी शुरू हो गई है। अलग-अलग पक्षों ने अपनी प्रतिक्रिया दी है।
तृणमूल कांग्रेस (TMC) का हमला
टीएमसी ने घटना की कड़ी निंदा की है। राज्य महासचिव कुणाल घोष ने तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, “जिन्हें नहीं खाना, वे न खरीदें। लेकिन एक गरीब हॉकर को पीटना गलत है। वह अपनी आजीविका कमा रहा है। यह कौन सा हिंदू धर्म है?”
पुलिस की सख्ती
दूसरी ओर, पुलिस ने भी फुर्ती दिखाई है। मैदान पुलिस स्टेशन ने एफआईआर दर्ज कर लिया है। पुलिस उपायुक्त (Central) ने इसकी पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि वीडियो से आरोपियों की पहचान हो रही है। जल्द ही गिरफ्तारी होगी।
आयोजकों की सफाई
वहीं, आयोजक संस्था ‘सनातन संस्कृति संसद’ ने पल्ला झाड़ लिया है। उनका कहना है कि वे हिंसा का समर्थन नहीं करते। उनका उद्देश्य केवल गीता पाठ था। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि आयोजन की गरिमा का ध्यान रखना चाहिए था।
आम जनता पर असर
यह घटना केवल एक पैटी वाले की नहीं है। यह बंगाल के बदलते माहौल को दिखाती है। सोशल मीडिया पर लोग दो गुटों में बंट गए हैं।
पहला गुट (समर्थक):
कुछ लोग भीड़ का समर्थन कर रहे हैं। उनका मानना है कि गीता पाठ के दौरान माहौल सात्विक होना चाहिए। इसलिए, वहां मांस नहीं बिकना चाहिए था।
दूसरा गुट (विरोधी):
वहीं, दूसरा पक्ष इसे “भीड़तंत्र” कह रहा है। वे इसे बंगाल की खान-पान की संस्कृति पर हमला मानते हैं। नतीजतन, डर का माहौल बन गया है।
अन्य विक्रेताओं में डर
इस घटना ने अन्य फेरीवालों को भी डरा दिया है। मैदान क्षेत्र में कई लोग मूढ़ी या रोल बेचकर पेट पालते हैं। अब वे भी सहमे हुए हैं। रियाजुल का कहना है, “मेरा 3000 रुपये का नुकसान हुआ। यह मेरे लिए बड़ी रकम है। लेकिन, मेरे आत्मसम्मान को ज्यादा चोट पहुंची है।”
निष्कर्ष: धर्म रक्षा या अधर्म?
अंततः, सवाल वही है: ‘चिकन पैटी बेचने वाला कितना सच्चा है?’ वह अपनी जगह पूरी तरह सही है। वह केवल अपना काम कर रहा था। उसे किसी नियम की जानकारी नहीं दी गई थी।
शास्त्र हमें संयम सिखाते हैं, आतंक नहीं। गीता के 16वें अध्याय में ‘दैवीय गुणों’ का वर्णन है। वहां अहिंसा, सत्य और दया को सबसे ऊपर रखा गया है। विडंबना देखिए, जिन युवकों ने “गीता की रक्षा” के लिए हिंसा की, उन्होंने गीता का सबसे बड़ा पाठ भुला दिया। वह पाठ है ‘करुणा’।
