दिल्ली दहलाने की साजिश! NIA चार्जशीट में 3 डॉक्टरों का ‘टेरर’ प्लान

पिछले साल अक्टूबर महीने में हरियाणा के फरीदाबाद से २,९०० किलोग्राम विस्फोटक (अमोनियम नाइट्रेट) के साथ ३ डॉक्टरों समेत ७ लोगों की गिरफ्तारी की घटना ने देश भर में जो…

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पिछले साल अक्टूबर महीने में हरियाणा के फरीदाबाद से २,९०० किलोग्राम विस्फोटक (अमोनियम नाइट्रेट) के साथ ३ डॉक्टरों समेत ७ लोगों की गिरफ्तारी की घटना ने देश भर में जो सनसनी फैलाई थी, उसके एक साल बाद राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने अदालत में एक विस्तृत आरोपपत्र (चार्जशीट) दायर किया है। इस चार्जशीट में, जैश-ए-मोहम्मद (JeM) और अंसार गजवत-उल-हिंद (AGuH) जैसे प्रतिबंधित आतंकी संगठनों से जुड़े इस Delhi-NCR terror module की भयावह योजनाओं का विस्तृत विवरण दिया गया है।

एनआईए द्वारा दायर इस चार्जशीट में आरोपियों के खिलाफ कठोर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत देशद्रोह और आपराधिक साजिश के आरोप लगाए गए हैं। जांच में पता चला है कि इस मॉड्यूल का लक्ष्य दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में श्रृंखलाबद्ध विस्फोट कर बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान करना और अस्थिरता पैदा करना था।

मुख्य तथ्य (Key Facts)

  • चार्जशीट दायर: फरीदाबाद टेरर मॉड्यूल मामले (अक्टूबर २०२४) में एनआईए ने ७ आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दायर की है।
  • आरोपी: ७ आरोपियों में ३ उच्च शिक्षित डॉक्टर (डॉ. आदिल अहमद रादर, डॉ. मुजाम्मिल शकील, डॉ. शाहीन) और एक मस्जिद का इमाम (इमाम इश्तियाक) शामिल हैं।
  • विस्फोटकों का जखीरा: जांच में २,९०० किलोग्राम अमोनियम नाइट्रेट, २ एके-४७ राइफल, २० टाइमर डिवाइस, २४ रिमोट कंट्रोल और ८३ जिंदा कारतूसों की बरामदगी की पुष्टि हुई है।
  • मुख्य साजिश: चार्जशीट के मुताबिक, लक्ष्य दिल्ली-एनसीआर के महत्वपूर्ण स्थानों, बाजारों और वीआईपी काफिलों पर बड़े IED विस्फोट करना था।
  • लाल किले की अफवाह: इस बीच, सोमवार (१० नवंबर, २०२५) को दिल्ली के लाल किले के पास एक कार विस्फोट की अफवाह सोशल मीडिया पर फैली। दिल्ली पुलिस ने इस खबर को “पूरी तरह निराधार” बताते हुए नागरिकों से अफवाहों पर ध्यान न देने की अपील की है।

पृष्ठभूमि: एक साल पहले का वह अभियान

अक्टूबर २०२४ में, जम्मू-कश्मीर पुलिस और हरियाणा पुलिस की एक संयुक्त टीम ने गुप्त सूचना के आधार पर फरीदाबाद के एक पते पर छापा मारा। यह अंतर-राज्यीय अभियान अत्यंत सुसंगठित था। पुलिस ने पहले संदिग्धों की गतिविधियों पर नजर रखी और फिर इस कार्रवाई को अंजाम दिया।

शुरुआती छापेमारी में ही जांचकर्ताओं के होश उड़ गए। एक घर और एक कार (विशेष रूप से डॉ. शाहीन की कार) से भारी मात्रा में विस्फोटक बनाने की कच्ची सामग्री बरामद हुई।

बरामद सामग्री की सूची (हरियाणा पुलिस, अक्टूबर २०२४ के अनुसार):

  1. अमोनियम नाइट्रेट: लगभग २,९०० किलोग्राम (जो सैकड़ों शक्तिशाली इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस या IED बनाने में सक्षम है)।
  2. हथियार: २ एके-४७ राइफल, ३ मैगजीन के साथ १ पिस्तौल।
  3. गोलियां: ८३ राउंड जिंदा कारतूस।
  4. बम बनाने के उपकरण: २० टाइमर डिवाइस (बम विस्फोट का समय नियंत्रित करने के लिए), २४ रिमोट कंट्रोल (दूर से विस्फोट करने के लिए), और बड़ी मात्रा में तार, बैटरी और रसायन।

हरियाणा पुलिस के तत्कालीन पुलिस महानिदेशक (DGP) ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया था, “यह एक बड़ी सफलता है। यह मॉड्यूल दिल्ली-एनसीआर में त्योहारी सीजन से ठीक पहले बड़े हमलों की योजना बना रहा था।” (स्रोत: पीटीआई, १२ अक्टूबर, २०२४)।

शुरुआत में यह भ्रम था कि बरामद सामग्री RDX हो सकती है। लेकिन बाद में फोरेंसिक जांच में पुष्टि हुई कि यह उच्च क्षमता वाला अमोनियम नाइट्रेट था, जिसका इस्तेमाल अतीत में भारत में कई बड़े विस्फोटों (जैसे २००८ के दिल्ली श्रृंखलाबद्ध विस्फोट) में किया गया है।

NIA चार्जशीट में क्या है?

मामले की गंभीरता को देखते हुए, गृह मंत्रालय ने जांच का जिम्मा एनआईए को सौंप दिया। पिछले एक साल की जांच के बाद, एनआईए ने जो चार्जशीट पेश की है, वह इस ‘व्हाइट कॉलर टेरर’ नेटवर्क की एक भयानक तस्वीर पेश करती है।

मुख्य आरोपी और उनकी भूमिका

चार्जशीट में नामजद ७ आरोपी हैं:

  • डॉ. आदिल अहमद रादर (उम्र ३१, पेशे से डॉक्टर)
  • डॉ. मुजाम्मिल शकील (उम्र ३५, पेशे से डॉक्टर)
  • डॉ. शाहीन (महिला डॉक्टर, जिसकी कार से हथियार मिले)
  • इमाम इश्तियाक (फरीदाबाद की एक मस्जिद से जुड़ा)
  • और तीन अन्य, जो मुख्य रूप से लॉजिस्टिक्स (रसद) और विस्फोटक आपूर्ति के काम में लगे थे। (एक डॉक्टर अभी भी फरार बताया जा रहा है)।

एनआईए की जांच में पता चला है कि डॉ. आदिल और डॉ. मुजाम्मिल इस मॉड्यूल के ‘मास्टरमाइंड’ थे। उन्हें ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए पाकिस्तान में बैठे हैंडलरों द्वारा कट्टरपंथी (radicalized) बनाया गया था और वे JeM और AGuH की विचारधारा से प्रेरित होकर भारत में ‘खिलाफत’ स्थापित करने के लक्ष्य से काम कर रहे थे।

उनकी जिम्मेदारियां थीं:

१. फंड जुटाना: मॉड्यूल चलाने के लिए धन मुहैया कराना।

२. लॉजिस्टिक्स: विस्फोटक और हथियार इकट्ठा करने और उन्हें छिपाने के लिए सुरक्षित ठिकानों की व्यवस्था करना।

३. भर्ती: अन्य शिक्षित युवाओं को मॉड्यूल में शामिल करना।

इमाम इश्तियाक पर आरोप है कि उसने अपनी धार्मिक पहचान की आड़ में आरोपियों को पनाह देने और विस्फोटक छिपाने में मदद की।

साजिश की गहराई

चार्जशीट के मुताबिक, यह २,९०० किलोग्राम अमोनियम नाइट्रेट जम्मू-कश्मीर से अलग-अलग चरणों में फरीदाबाद लाया गया था। आरोपियों ने IED बनाने के लिए सभी उपकरण, जैसे टाइमर और रिमोट कंट्रोल, इकट्ठे कर लिए थे।

उनके प्राथमिक निशाने थे:

  • दिल्ली के भीड़-भाड़ वाले बाजार (जैसे सरोजिनी नगर या लाजपत नगर)।
  • महत्वपूर्ण सरकारी इमारतें।
  • दिल्ली-एनसीआर के विभिन्न धार्मिक स्थल।

जांचकर्ताओं को एक ‘डार्क वेब’ चैट रूम का भी पता चला है, जहां आरोपी अपने पाकिस्तानी हैंडलरों के संपर्क में थे और हमलों के स्थानों और समय पर चर्चा करते थे।

विशेषज्ञ विश्लेषण: ‘व्हाइट कॉलर टेरर’ का खतरा

यह घटना भारत की सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी चिंता का कारण बन गई है। आमतौर पर यह माना जाता है कि आतंकवाद में मुख्य रूप से वंचित या अशिक्षित युवा शामिल होते हैं। लेकिन फरीदाबाद मॉड्यूल ने इस धारणा को पूरी तरह तोड़ दिया है।

रक्षा विशेषज्ञ और इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट के सीनियर फेलो (सेवानिवृत्त), अजय साहनी के अनुसार, “शिक्षित पेशेवरों, विशेषकर डॉक्टरों का आतंकवाद में शामिल होना एक बेहद खतरनाक प्रवृत्ति है। उनके पास सामाजिक सम्मान और आवाजाही की स्वतंत्रता होती है, जो उन्हें संदेह से परे रखती है। वे आसानी से रसायनों और विस्फोटकों का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं और नेटवर्क के लिए धन जुटा सकते हैं।” (स्रोत: विभिन्न मीडिया में प्रकाशित विश्लेषण, अक्टूबर २०२४)।

डॉक्टर जैसे पेशेवर, जो जीवन बचाने की शपथ लेते हैं, जब वे सामूहिक विनाश की योजनाओं में शामिल होते हैं, तो यह समाज के नैतिक ताने-बाने पर भी प्रहार करता है। एनआईए इस बात की जांच कर रही है कि क्या इस मॉड्यूल से कोई और ‘स्लीपर सेल’ या अन्य पेशेवर जुड़े हुए हैं।

लाल किले के विस्फोट की अफवाह: एक समानांतर खतरा

जिस समय एनआईए एक पुराने और गंभीर मामले में चार्जशीट दायर कर रही है, ठीक उसी समय सोमवार (१० नवंबर, २०२५) शाम को सोशल मीडिया पर एक खबर फैल गई कि “दिल्ली के लाल किले के पास एक कार में विस्फोट हुआ है।”

इस रिपोर्टर द्वारा दिल्ली पुलिस मुख्यालय से संपर्क करने पर, एक वरिष्ठ अधिकारी (नाम न छापने की शर्त पर) ने इस खबर को पूरी तरह खारिज कर दिया।

“लाल किले या उसके आसपास किसी भी तरह के विस्फोट या यहां तक कि किसी कार में आग लगने की भी कोई घटना नहीं हुई है। यह एक पूरी तरह से अफवाह है, जो शायद आतंक फैलाने के लिए जानबूझकर फैलाई जा रही है। हमने सोशल मीडिया मॉनिटरिंग सेल को इस अफवाह के स्रोत का पता लगाने का निर्देश दिया है। नागरिकों से हमारी अपील है कि बिना पुष्टि किए कुछ भी साझा न करें।” — वरिष्ठ अधिकारी, दिल्ली पुलिस (१० नवंबर, २०२५)

विशेषज्ञों का मानना है कि फरीदाबाद मॉड्यूल जैसे वास्तविक खतरों के साथ-साथ इस तरह का “सूचना आतंकवाद” या ‘दुष्प्रचार अभियान’ (Disinformation Campaign) भी सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती है। इस तरह की अफवाहें अक्सर समाज में घबराहट पैदा करती हैं और कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगाड़ने की कोशिश करती हैं।

अगला कदम और निष्कर्ष

एनआईए की चार्जशीट दाखिल होने के बाद, आरोपियों के खिलाफ विशेष अदालत में न्यायिक प्रक्रिया शुरू होगी। जांच एजेंसियां फरार डॉक्टर समेत इस नेटवर्क के बाकी सदस्यों की तलाश में जुटी हैं।

फरीदाबाद मॉड्यूल यह साबित करता है कि आतंकवाद का खतरा अब केवल सीमाओं तक ही सीमित नहीं है; यह हमारे समाज के उच्च शिक्षित तबके में भी प्रवेश कर चुका है। २,९०० किलोग्राम विस्फोटक की बरामदगी एक बड़ी सफलता है, लेकिन इस घटना ने सुरक्षा एजेंसियों को अपने खुफिया तरीकों और ऑनलाइन कट्टरपंथ से निपटने की रणनीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। वहीं, लाल किले की अफवाह की घटना यह साबित करती है कि एक नागरिक के तौर पर तथ्यों की जांच करना कितना महत्वपूर्ण है।

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