नीतीश ने रचा इतिहास, 10वीं बार ली शपथ

बिहार की राजनीति के 'चाणक्य' कहे जाने वाले नीतीश कुमार ने आज पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में एक बार फिर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। यह रिकॉर्ड 10वां मौका…

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बिहार की राजनीति के ‘चाणक्य’ कहे जाने वाले नीतीश कुमार ने आज पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में एक बार फिर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। यह रिकॉर्ड 10वां मौका है जब नीतीश कुमार ने राज्य के मुखिया के तौर पर कमान संभाली है। 2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए को मिले ऐतिहासिक जनादेश (202 सीटों) के बाद, आज का शपथ ग्रहण समारोह शक्ति प्रदर्शन और राजनीतिक स्थिरता का प्रतीक बन गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और एनडीए शासित राज्यों के कई मुख्यमंत्रियों की मौजूदगी में राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई।

महत्वपूर्ण तथ्य: एक नज़र में

  • रिकॉर्ड शपथ: नीतीश कुमार ने 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, जो भारतीय राजनीति में एक रिकॉर्ड है।

  • जनादेश 2025: एनडीए ने 243 में से 202 सीटें जीतकर अब तक की सबसे बड़ी जीत दर्ज की (भाजपा 89, जदयू 85)।

  • विपक्ष का सूपड़ा साफ़: तेजस्वी यादव के नेतृत्व में आरJD (RJD) मात्र 25 सीटों पर सिमट गई।

  • डिप्टी सीएम: भाजपा के सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा ने फिर से उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

  • मुख्य अतिथि: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सिग्नेचर अंदाज में ‘गमछा’ लहराकर भीड़ का अभिवादन किया।

शपथ ग्रहण: गांधी मैदान में ‘जय बिहार’ का उद्घोष

दोपहर ठीक 11:30 बजे, जैसे ही नीतीश कुमार मंच पर आए, पूरा गांधी मैदान ‘नीतीश कुमार जिंदाबाद’ और ‘जय बिहार’ के नारों से गूंज उठा। सफेद कुर्ता-पायजामा और अपनी पहचान बन चुकी बंडी पहने नीतीश कुमार ने शांत और सधे हुए अंदाज में हिंदी में शपथ ली। उनके साथ भाजपा कोटे से सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा ने भी शपथ ली, जिससे यह साफ हो गया कि एनडीए ने अपने पुराने फॉर्मूले को ही 2025-2030 के कार्यकाल के लिए बरकरार रखा है।

शपथ के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने नीतीश कुमार को गले लगाकर बधाई दी और ट्वीट किया:

“बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने पर श्री नीतीश कुमार जी को बधाई। वे एक अनुभवी प्रशासक हैं और सुशासन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने बिहार को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। एनडीए की यह जीत ‘विकसित बिहार’ के संकल्प की जीत है।”

जनादेश 2025: एनडीए की ‘सुनामी’ और आरजेडी का पतन

इस बार का चुनाव परिणाम राजनीतिक पंडितों के लिए भी चौंकाने वाला रहा। जहां ‘तेजस्वी 2.0’ और रोजगार के वादों की चर्चा थी, वहीं नतीजों ने साफ कर दिया कि बिहार की जनता ने ‘सुशासन’ और केंद्र-राज्य के ‘डबल इंजन’ पर भरोसा जताया है।

आंकड़ों में जीत (ECI डेटा):

पार्टी/गठबंधन सीटें (2025) बदलाव (2020 से) वोट शेयर (%)
एनडीए (कुल) 202 +77 54%
भाजपा 89 +15 24%
जदयू 85 +42 22%
महागठबंधन 35 -75 31%
आरजेडी 25 -50 18%

(स्रोतः भारत निर्वाचन आयोग, परिणाम नवंबर 2025)

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक और पटना विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर डॉ. ए.के. सिंह का मानना है, “नीतीश कुमार का ‘महिला सशक्तिकरण’ (जीविका दीदी और शराबबंदी) और पीएम मोदी का ‘अति-पिछड़ा कार्ड’ आरजेडी के एम-वाई (MY) समीकरण पर भारी पड़ा। तेजस्वी यादव का नेतृत्व इस बार सत्ता विरोधी लहर को भुनाने में पूरी तरह विफल रहा।”

अर्थव्यवस्था और चुनौतियां: आगे क्या?

नई सरकार के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। हालांकि राजनीतिक स्थिरता मिल गई है, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर बिहार को अभी लंबी छलांग लगानी है। हाल ही में पेश किए गए बिहार आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के आंकड़े बताते हैं कि राज्य सही दिशा में है, लेकिन रफ्तार बढ़ानी होगी।

  • विकास दर: बिहार ने 2023-24 में 14.5% की विकास दर दर्ज की, जो देश के बड़े राज्यों में दूसरी सबसे अधिक है।

  • जीएसडीपी (GSDP): राज्य की अर्थव्यवस्था का आकार बढ़कर ₹8.54 लाख करोड़ हो गया है।

  • प्रति व्यक्ति आय: यह बढ़कर ₹66,828 (मौजूदा कीमतों पर) हो गई है, लेकिन राष्ट्रीय औसत से अभी भी काफी नीचे है।

(स्रोतः बिहार आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25, वित्त विभाग)

नीतीश कुमार ने शपथ के तुरंत बाद कहा, “यह जनादेश जिम्मेदारी का है। अगले 5 साल केवल और केवल ‘रोजगार’ और ‘औद्योगिक निवेश’ पर केंद्रित होंगे। हम बिहार को देश के शीर्ष 5 राज्यों में शामिल करेंगे।”

विशेषज्ञ की राय

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (CSDS) के आंकड़ों का हवाला देते हुए वरिष्ठ पत्रकार सुमित कुमार कहते हैं:

“इस चुनाव में महिला मतदाताओं ने पुरुषों की तुलना में 6% अधिक मतदान किया, और उनका 60% वोट एनडीए को गया। यह ‘साइलेंट वोटर’ ही नीतीश कुमार की असली ताकत है, जो जातिगत समीकरणों को ध्वस्त कर देता है।”

निष्कर्ष

नीतीश कुमार का 10वीं बार शपथ लेना न केवल उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता को साबित करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि बिहार की राजनीति अभी भी उनके इर्द-गिर्द ही घूमती है। 74 वर्ष की आयु में, यह कार्यकाल संभवतः उनकी विरासत को परिभाषित करने वाला अंतिम और निर्णायक अध्याय होगा। अब देखना यह होगा कि क्या ‘सुशासन बाबू’ अपनी इस पारी में बिहार को ‘विशेष राज्य’ का दर्जा या उसके समकक्ष आर्थिक पैकेज दिला पाते हैं या नहीं।

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