पश्चिम बंगाल में एक अजीबोगरीब ‘चमत्कार’ हुआ है। विज्ञान कहता है कि जीवन है तो मृत्यु निश्चित है, लेकिन बंगाल के 2,208 पोलिंग बूथों (Polling Booths) के आंकड़े कुछ और ही कहानी कह रहे हैं। इन बूथों पर पिछले कुछ वर्षों में न तो कोई वोटर मरा है, न कोई कहीं गया है, और न ही कोई गैर-हाजिर है। चुनाव आयोग (ECI) की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) में सामने आए इस Electoral Roll Fraud के संकेतों ने दिल्ली तक हलचल मचा दी है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार अब सीधे इस ‘सांख्यिकीय असंभवता’ (Statistical Impossibility) पर जवाब मांग रहे हैं।
खबर एक नज़र में
- अंकीय विसंगति: बंगाल के 2,208 बूथों पर ‘जीरो डेथ रेट’ (Zero Death Rate) और ‘जीरो शिफ्टिंग’ पाई गई है, जो सांख्यिकीय रूप से असंभव है।
- हॉटस्पॉट: सबसे ज्यादा ऐसे ‘अमर’ बूथ दक्षिण 24 परगना (760), पुरुलिया (228) और मुर्शिदाबाद (226) में मिले हैं।
- सख्त कार्रवाई: चुनाव आयोग ने इसे “अप्राकृतिक” मानते हुए सभी जिलाधिकारियों (DMs) से 24 घंटे के भीतर रिपोर्ट तलब की है।
- राजनीतिक आरोप: शुभेंदु अधिकारी (BJP) का दावा है कि यह ‘घोस्ट वोटर्स’ (Ghost Voters) को बचाने की साजिश है, जबकि TMC इसे ECI द्वारा फैलाया गया ‘पैनिक’ बता रही है।
क्या बंगाल में मौत पर ‘ब्रेक’ लग गया है? (The Data Anomaly)
सामान्य जनसांख्यिकीय आंकड़ों (Demographics) के अनुसार, भारत में सालाना मृत्यु दर (Death Rate) लगभग 6-7 प्रति 1000 व्यक्ति है। यानी, अगर किसी बूथ पर 1000 वोटर हैं, तो एक साल में औसतन 6-7 लोगों की मृत्यु स्वाभाविक है। लेकिन पश्चिम बंगाल के 2,208 बूथों से जो डेटा आया है, उसने गणित और विज्ञान दोनों को चुनौती दे दी है।
इन बूथों पर चल रहे विशेष पुनरीक्षण (SIR) के दौरान ‘Uncollectible Forms’ की संख्या शून्य पाई गई है। चुनावी भाषा में इसका मतलब है कि BLO (बूथ लेवल ऑफिसर) को इन बूथों पर एक भी ऐसा फॉर्म नहीं मिला जो किसी मृत, स्थानांतरित (Shifted) या दोहरी प्रविष्टि (Duplicate) वाले वोटर का हो।
चुनाव आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा:
“यह पूरी तरह बेतुका (Absurd) है। ऐसा कैसे संभव है कि हजारों की आबादी वाले इन इलाकों में पिछले कई महीनों या सालों में एक भी व्यक्ति की मौत न हुई हो और न ही कोई अपना घर छोड़कर कहीं गया हो? यह डेटा की शुद्धता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।”
वो जिले जहां ‘चमत्कार’ हुआ (District-wise Breakdown)
चुनाव आयोग के रडार पर आए इन बूथों का वितरण इस प्रकार है:
| जिला (District) | संदिग्ध बूथों की संख्या (Zero Deities/Shifting) |
| दक्षिण 24 परगना | 760 (सर्वाधिक) |
| पुरुलिया | 228 |
| मुर्शिदाबाद | 226 |
| मालदा | 216 |
| नादिया | 130 |
| बांकुरा | 101 |
(डेटा स्रोत: मुख्य निर्वाचन अधिकारी, पश्चिम बंगाल कार्यालय – 1 दिसंबर, 2025 की रिपोर्ट)
‘घोस्ट वोटर्स’ की तलाश और ECI का अल्टीमेटम
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार (Gyanesh Kumar) और उनकी टीम ने इस विसंगति को हल्के में नहीं लिया है। दिल्ली स्थित ‘निर्वाचन सदन’ से आए कड़े निर्देशों के बाद, बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) मनोज अग्रवाल ने सभी संबंधित जिलाधिकारियों (जो जिला निर्वाचन अधिकारी भी हैं) को “कारण बताओ” (Show Cause) मोड में डाल दिया है।
आयोग का स्पष्ट मानना है कि यह BLO (बूथ लेवल ऑफिसर्स) द्वारा जानबूझकर की गई लापरवाही हो सकती है, या फिर उन्हें स्थानीय राजनीतिक दबाव में ‘मृत’ और ‘फर्जी’ वोटरों को लिस्ट से हटाने से रोका गया है।
तकनीकी पेंच: क्या है ‘Uncollectible Form’?
जब चुनाव आयोग वोटर लिस्ट अपडेट करता है, तो BLO घर-घर जाकर फॉर्म भरवाते हैं। अगर कोई वोटर मर चुका है या वहां नहीं रहता, तो उसका फॉर्म ‘Uncollectible’ (जमा न होने योग्य) श्रेणी में आता है और उसका नाम लिस्ट से कटना चाहिए। इन 2,208 बूथों पर 100% फॉर्म जमा दिखाए गए हैं, जिसका मतलब है कागजों पर ‘सब चंगा सी’, लेकिन हकीकत में शायद ‘घोस्ट वोटर्स’ की भरमार।
राजनीतिक रण: “लाशों पर राजनीति” बनाम “फर्जी वोटर”
इस खुलासे के बाद बंगाल का सियासी पारा सातवें आसमान पर है। 2026 विधानसभा चुनाव से पहले यह मुद्दा ‘करो या मरो’ का रूप ले चुका है।
विपक्ष का हमला: “साजिश का पर्दाफाश”
विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी (Suvendu Adhikari) ने इसे एक संगठित अपराध बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य प्रशासन और सत्ताधारी पार्टी मिलकर रोहिंग्या और अवैध घुसपैठियों के नाम वोटर लिस्ट में बचाए रखने के लिए यह खेल खेल रहे हैं।
“मैंने पहले ही कहा था कि बंगाल की वोटर लिस्ट में 1 करोड़ से ज्यादा फर्जी प्रविष्टियां हैं। अब ECI ने खुद 2,208 बूथों पर मुहर लगा दी है। क्या इन बूथों पर लोग अमृत पीकर बैठे हैं? यह लोकतंत्र की हत्या है।” शुभेंदु अधिकारी, विपक्ष के नेता
सरकार का पलटवार: “ECI फैला रहा डर”
दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने ECI की इस सख्ती को बंगाल के लोगों के खिलाफ ‘उत्पीड़न’ बताया है। पार्टी का आरोप है कि आधार कार्ड डी-लिंकिंग और वोटर लिस्ट वेरिफिकेशन के नाम पर लोगों में डर पैदा किया जा रहा है, जिससे कई लोगों की जान जा चुकी है।
“चुनाव आयोग भाजपा की एक शाखा (Extended Arm) की तरह काम कर रहा है। BLOs पर इतना दबाव डाला जा रहा है कि वे तनाव में काम कर रहे हैं।आयोग की ‘अति-सक्रियता’ के कारण राज्य में ‘पैनिक’ का माहौल है, जिसके चलते आत्महत्याएं भी हुई हैं। क्या ज्ञानेश कुमार इसकी जिम्मेदारी लेंगे?” चंद्रिमा भट्टाचार्य, मंत्री और TMC नेता
विशेषज्ञ विश्लेषण: यह सांख्यिकीय रूप से क्यों असंभव है?
सांख्यिकीविद (Statisticians) और चुनाव विश्लेषक इस डेटा को “रेड फ्लैग” मान रहे हैं।
- प्राकृतिक मृत्यु दर: पश्चिम बंगाल की अनुमानित मृत्यु दर 6.3 प्रति 1000 है। 760 बूथों वाले दक्षिण 24 परगना जैसे बड़े जिले में ‘शून्य मृत्यु’ का डेटा किसी भी वैज्ञानिक पैमाने पर खरा नहीं उतरता।
- पलायन (Migration): बंगाल के मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिलों से बड़ी संख्या में लोग काम के लिए बाहर जाते हैं। इन जिलों में भी ‘शिफ्टेड वोटर्स’ का न मिलना डेटा में भारी हेराफेरी (Manipulation) का संकेत है।
- BLO पर दबाव: जमीनी हकीकत यह हो सकती है कि स्थानीय बाहुबलियों के डर से BLOs ने ‘मृत’ वोटरों को ‘जीवित’ दिखा दिया हो ताकि वोटिंग के दिन उनका इस्तेमाल ‘प्रॉक्सी वोटिंग’ (Proxy Voting) के लिए किया जा सके।
आगे क्या?
यह मामला अब केवल एक प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि एक संवैधानिक सवाल बन गया है।
- डेडलाइन: जिलाधिकारियों (DMs) को आज (मंगलवार, 2 दिसंबर) सुबह 10 बजे तक अपनी रिपोर्ट ECI को सौंपनी थी।
- फिजिकल वेरिफिकेशन: आयोग अब इन 2,208 बूथों पर केंद्रीय पर्यवेक्षकों (Central Observers) की देखरेख में 100% फिर से फिजिकल वेरिफिकेशन करवा सकता है।
- अधिकारियों पर गाज: अगर यह साबित हुआ कि जानबूझकर गलत डेटा फीड किया गया, तो कई BLOs और EROs (इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स) पर निलंबन की गाज गिर सकती है।
निष्कर्ष:
बूथ नंबर 2208 (या यूँ कहें 2,208 संदिग्ध बूथ) अब बंगाल की राजनीति का केंद्र बिंदु बन गए हैं। अगर चुनाव आयोग इन ‘अमर’ वोटरों के रहस्य से पर्दा उठाने में सफल रहता है, तो वोटर लिस्ट से लाखों नाम कट सकते हैं, जो आगामी चुनावों की दिशा और दशा दोनों बदल देंगे। फिलहाल, बंगाल में विज्ञान हारा हुआ और सियासत जीती हुई नज़र आ रही है।
